खाडुभाई

पहाड़ों से खरी खरी

दिल्ली मंडी पर भारी हिमाचल की स्थानीय सेब मंडियां

Posted by NITYIN on September 6, 2009

Apple हिमाचल प्रदेश में इस बार सेब की फसल की पैदावार पिछले वर्षों से आधी है. सर्दियों में बर्फ का गिरना जहाँ एक बड़ा कारण है वहीँ बाद में मानसून की देरी ने भी फसल को चौपट कर डाला. इस सब में बागवान फिर भी खुश हैं. इस बार दाम ज्यादा मिल रहे हैं. २५ किलो की सेब की पेटी १०००/ रूपये में बिक रही है. इस से पहले उत्तम किस्म की सेब की पेटी के ५००/ रूपये मिले करते थे.

बड़े दामों का एक कारण जहाँ मांग और पूर्ती की खाई है वहीँ यहाँ पर स्थानीय मंडियों का खुलना भी है. अब बागवान दिल्ली की मंडी पर पूरी तरह आश्रित नहीं हैं. इस से पहले सारी फसल को दिल्ली भेजना पड़ता था जहाँ बागवान लुटते थे. अब शिमला में एक बड़ी मंडी खुल गयी है. साथ ही जिला शिमला में खडापत्थर, रोहडू, नारकंडा और खेक्सू में मंडियों में सेब ख़रीदा और बेचा जा रहा है.

इन मंडियों के खुलने से बागवान अब अपनी फसल अपने सामने बेच रहे हैं. तुडाई और भराई के बाद अब सेब दूसरे दिन ही मंडियों में पहुँच जाते हैं. साथ ही अब बागवानों को इन सब कामों के लिए ज्यादा लोगों की आवश्यकता नहीं रह गयी है. पहले यह नहीं होता था. सेब की सारी फसल ट्रक में भर कर दिल्ली भेजी जाती थी. इसलिए फसल की तुडाई  और भराई के किये बहुत सारे लोगों को काम पर लगाया जाता था. साथ ही दिल्ली तक ट्रक का किराया भी बागवानों को अपनी जेब से ही भरना पड़ता था.  अब बागवान एक साथ ८०-१०० पेटियां मंडी पहुंचाते हैं. मंडी में सेब बिकता देख अब वह जान चुके हैं कि किस प्रकार सेब के अच्छे मूल्य प्राप्त किये जा सकते हैं. यदि मंडी में भावः गिर जाते हैं तो बागवान अपना माल रोक सकते हैं.

दिल्ली के आढ़तियों ने बागवानों  को बुरी तरह लूटा है. वहां सेब किस तरह बिकता है कोई नहीं जानता. बोली के समय गुप्त भाषा का प्रयोग होता है. बागवान जान ही नहीं पाता कि क्या हो रहा है. उसे तो जब बिक्री का पर्चा थमाया जाता है तब मालूम होता है कि फसल कितनी में बिकी. साथ ही दिल्ली मंडी में बागवानों से बिक्री पर कमीशन वसूली जाती है. देश कि किसी मंडी में किसानों और बागवानों से कोई कमीशन नहीं ली जाती है. हालाँकि दिल्ली के मंडी कानून के हिसाब से कमीशन लेना मना है पर सुनता कौन है? इस मुद्दे पर हिमाचल और दिल्ली सरकारें दोनों मौन हैं. हालाँकि हर साल सेब कि तुडाई से पहले नेताओं द्वारा बड़ी बड़ी बातें जरूर कही जाती हैं पर आखिर में होता कुछ नहीं है. कहता हैं कि दिल्ली के आढ़ती हर चुनाव में मोटा पैसा लगते हैं. यह पैसा कमीशन द्वारा ही इकठा होता है. अब भला हमारे नेता कमीशन रोक कर अपने पैरों पर तो कुल्हाडी मारने से रहे.

अब बात अदानी और बड़ी कंपनियों की जो यहाँ पर कोल्ड स्टोर चलाती हैं और बागवानों से सीधा सेब खरीदते हैं. यह कंपनियां छोटे बागवानों के लिए बिलकुल भी फायदेमंद नहीं हैं. अच्छे किस्म के सेब के यह बहुत कम दाम देती हैं. इस साल सबसे बढ़िया सेब का दाम ३८/ रूपये निर्धारित किया गया है. मंडियों में यही सेब ५५/ से ६०/ रूपये किलो बिकता है. इन कंपनियों को मुख्यत: बड़े बागवान ही सेब बेचते हैं.

आने वाले समय में यह मंडियां बागवानों के लिए और भी फायदेमंद साबित होंगी. साथ ही जगह जगह इन मंडियों के खुलने से बागवानों को दिल्ली कि मंडी से छुटकारा मिलेगा. भविष्य में और अधिक खरीदार सीधे बागवानों के पास आकर सेब खरीदेंगे. इससे भी दिल्ली कि मंडी का एकाधिकार टूटेगा. बागवानों के लिए यह शायद एक अच्छी खबर है.

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