हिमाचल किसान आन्दोलन
Posted by NITYIN on September 2, 2009
१९९० के सेब आन्दोलन की इन्टरनेट पर कुछ भी जानकारी नहीं है. यहाँ उस पर लिखना चाहूँगा. सेब के समर्थन मूल्य की वृद्धि पर किसान सड़कों पर उतर आये थे. हिमाचल में सेब का समर्थन मूल्य दिया जाता है. उस साल सरकार ने केवल २५ पैसे की मूल्य वृद्धि की थी. इससे किसान भड़क उठे. भला २५ पैसे की भी कोई वृद्धि होती है? किसान सरकार से १ रूपये बढाने की मांग कर रहे थे. प्रदेश में उस समय भाजपा की सरकार थी और श्री शांता कुमार मुख्यमंत्री. शांता कुमार अपने अड़ियल स्वाभाव के लिए जाने जाते हैं. बस अड़ गए.
मैं उस समय बारवीं कक्षा में शिमला में पढ़ रहा था. हिमाचल किसान सभा के आह्वान पर पहाडों से किसान शिमला में इकत्रित हुए थे. इतनी बड़ी संख्या में मैंने कभी शिमला में लोग नहीं देखे थे. पूरा शहर लोगों से भर गया था. पुलिस बंदोबस्त काफी तगड़ा था लेकिन जब किसान शिमला पहुंचे तो मानो पुलिस भी कम पड़ गयी थी. किसानों को रोकने की पहली कोशिश संजौली में की गयी लेकिन पुलिस बल उनके सामने कम पड़ गया. संजौली से वह लोग पैदल ही शिमला की तरफ चल पड़े. शिमला के सब्जी मण्डी ग्राउंड में धुँआधार रैली हुई. इसके बाद रोजाना धरने प्रदर्शन किये जाने लगे. गांवों में भी किसानों ने प्रदेश सरकार के दफ्तरों के सामने प्रदर्शन शुरू कर दिया था. महिलाएं भी इसमें जम कर हिस्सा लेती थी.
पूरा शिमला जिला शांता कुमार मुर्दाबाद के नारों से गूंज उठा था. सरकारी दफ्तरों और
बैंकों में काम ठप हो गया. प्रशासन तो मानो पंगु हो चुका था. शिमला में भी सचिवालय और माल रोड पर धरना प्रदर्शन जारी था. शांता कुमार के कानों में फिर भी जूं तक न रेंगी. उल्टे सरकार ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे किसानों पर डंडे बरसाने शुरू कर दिए.
किसान नेताओं ने किसानों से शिमला दोबारा पहुँचने का आह्वान किया. इस बार तो किसानों के साथ उनके परिवार भी चल दिए. लेकिन उन को शिमला न पहुँचने दिया गया. फागु के पास बेखलती में उनको रोक दिया गया. यह लोग भी यहीं धरने पर बैठ गए. इस बीच कुछ लोग दुसरे रास्तों से शिमला पहुँचने में कामयाब हो गए थे. बेखलती में पुलसिया कहर किसानों और उनके परिवारों पर टूट पड़ा. उनको तितर बितर करने के लिए पुलिस ने रात में ही लाठी चार्ज कर डाला. बच्चे, बूढे, महिलाएं सभी पुलिस के कहर से थर्रा गए थे.
शिमला में भी पुलिस का कहर सब्जी मंडी मैदान में सब से पहले देखने को मिला. यहाँ हो रहे प्रदर्शन पर पुलिस ने बिना किसी चेतावनी के डंडे बरसाने शुरू कर दिए. यहाँ मैदान में महिलाएं ज्यादा थी. उनको जम कर पीटा गया. इस के बाद जो लोग यहाँ से भाग कर माल रोड पहुंचे उनको पुलिस ने माल रोड पर पीट डाला. पहाड़ के लोगों का अलग ही पहनावा होता है. इस लिए इन को पहचानना आसान रहता है. जो भी पहाड़ी वेशभूषा में मिला जम कर पिटा और जेल में ठूंस दिया गया. उस दिन मैं भी सब्जी मंडी ग्राउंड में था. पुलिस का यह अत्याचार देख मैं भी दंग रह गया. शाम को किसान फिर इकठे हुए और लोअर बाज़ार में रैली करने लगे. वहां उन पर आसपास के घरों से गरम पानी उंडेल दिया गया.
पूरे दिन पुलिस ने किसानों को जहाँ मिले वहीँ पीट डाला. उस दिन तो शायद ही कोई किसान हो जिस ने डंडे न खाए हो. भागने के लिए पूरा शहर कम पड़ गया था. जो किसान पकडे गए उनसे पैसे छीन कर बसों में नाहन, नादौन जैसे दूर दूर स्थानों में छोड़ दिया गया.
यह खबर जैसे ही फ़ैली मानों पहाड़ पागल हो गए. जगह जगह सरकारी दफ्तरों पर हमले शुरू हो गए, बसें फूंकी गयी. हर तरफ बस गुस्सा ही गुस्सा था. कोटगढ़ में भी किसान पुलिस चौकी के बाहर प्रदर्शन के लिए इकट्ठे हो लिए थे. भारी भीड़ जमा हो चुकी थी. पुलिस वाले यह सब देख घबरा उठे और भीड़ पर ताबड़ तोड़ गोलियां बरसाने लगे. दिन दिहाड़े तीन किसानों को गोलियों से उड़ा दिया गया. फिर तो पूरा शिमला जिला ही जल उठा. प्रशासन नाम की तो कोई चीज़ ही नहीं रह गयी. सरकारी कर्मचारी सब भाग खड़े हुए. कोटगढ़ की पुलिस चौकी को फूँक दिया गया. सरकारी दफ्तर जला डाले गए. आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा और किसानों से अपना आन्दोलन वापस लेने की गुहार करनी पड़ी.
यदि शांता कुमार चाहते तो बात को बढ़ने से आसानी से रोक सकते थे. लेकिन अपने अड़ियल रुख से उन्होंने पहाडों को जला डाला. किसानों के आत्मसम्मान पर शांता जी डंडे बरसाते रहे. घर की औरतों को भी नहीं बख्शा. यहाँ के लोगों ने आज तक उनको माफ़ नहीं किया है.
खैर इस के बाद उनके राजनीतिक जीवन पर ऐसी काली छाया पड़ी कि फिर मुख्यमंत्री कि कुर्सी नसीब नहीं हुई.




हर्षवर्धन said
राजनीति में एक फैसला चढ़ा देता है तो, एक फैसला जिंदगी भर पछताने के लिए छोड़ देता है। सत्ता के दंभ में तो, वैसे ही कुछ समझ में नहीं आता।
Deepak Thakur said
Shanta Kumar committed inhuman atrocities on the people of Himachal Pradesh, particularly against those of Shimla, Kulu, Kinnaur & Sirmour District, which can be compared only to what Hitler did to the Jews. He is a masochist and totalitarian person. His hands are tainted with the blood of the 3 youths who were killed in the illegal police firing ordered by Shanta Kumar in Kotgarh in June 1991.