खाडुभाई

पहाड़ों से खरी खरी

हनोल – प्रकृति का एक अदभुत नजारा

Posted by NITYIN on January 5, 2009

आज में आपको हिमाचल प्रदेश से सटे उत्तराखंड राज्य में स्थित हनोल नामक छोटे से गाँव के बारे में बताता हूँ। यह गाँव रोहडू से करीबन दो घंटे की दूरी पर है।   रोहडू से आप सावडा होते हुए अंटी पर हिमाचल प्रदेश की सीमा  पार करके उत्तराखंड राज्य में प्रवेश करते हैं। समरकोट होते हुए आप त्यूणी पहुँचते हैं। त्यूणी से पब्बर नदी पार करके इस राज्य के उत्तरकाशी जिले में प्रवेश करते हैं।   यह एक मनमोहक यात्रा है। रोहडू से त्यूणी तक पब्बर नदी का नज़ारा बड़ा ही रमणीय है। हालाँकि यह मार्ग बीच बीच मैं उबड़ खाबड़ भी है। त्यूणी से पैंतालीस मिनट की दूरी पर हनोल स्थित है।

पब्बर नदी त्यूणी से आगे कई छोटे छोटे गाँव हैं और यहाँ का नज़ारा भी देखते ही बनता है। दूर बहती रूपन और सूपन नदियाँ एक अलग ही छटा भिकेरती हैं। हनोल, महासू देवता के मन्दिर के लिए दूर दूर तक प्रसिद्ध है। पहले जिला शिमला, सोलन और सिरमौर को महासू के नाम से जाना जाता था। बाद में राज्यों के बँटवारे के बाद यह क्षेत्र पहले उत्तर प्रदेश और अब उत्तरांचल राज्य का हिस्सा बन गया। महासू देवता का मन्दिर बिल्कुल पहाड़ी शैली में बना है। मुख्य सड़क से नीचे उतर कर आप महासू मन्दिर मन्दिर के आँगन में प्रवेश करते हैं। इस मन्दिर की वास्तु कला देखते ही बनती है। मुख्य मन्दिर में महिलायों का प्रवेश वर्जित है। देवता जी के दर्शन के लिए कपाट खुलवाने पड़ते हैं। लोग दूर दूर से अपनी मन्नत मांगने यहाँ आते हैं। जैसा की  पहाड़ों में प्रथा है मन्नत पूरी होने पर देवता जी को बकरे की बलि देनी होती है। अब यहाँ हालाँकि जिन्दा बलि नहीं दी जाती है। यहाँ पर ठहरने का भी उचित प्रबंध है। गढ़वाल मंडल विकास निगम द्वारा संचालित एक यात्री निवास यहाँ उपलब्ध है। इस जगह पर अभी मोबाइल फ़ोन की घंटी बजनी शुरू नहीं हुई है। इसलिए भी यह जगह आप को सुकून के  पल दे सकती है।

यात्री निवास यहाँ आने के लिए आपको शिमला से पहले रोहडू आना पड़ेगा। रात यहाँ रुकने के बाद आप सुबह हनोल के लिए सीधी बस ले सकते हैं। दोपहर में यही बस वापस रोहडू आती है। यदि आप हनोल रात रुकना चाहते हैं तो शिमला से सुबह नौ बजे शांकरी के लिए बस पकड़िये। यह बस शाम पाँच बजे हनोल पहुँचती है। त्यूणी से आप लाल चावल की खरीदारी कर सकते हैं। अपने लाल रंग की विशेषता रूपन नदी वाले यह चावल आप को शायद ही कहीं और मिलें। यह स्वास्थ्य के हिसाब से भी अत्यन्त गुणकारी हैं। धान की नई फसल नवम्बर में आती है। वैसे भी चावल जितना पुराना हो उतना अच्छा रहता है।

यह पूरा क्षेत्र अभी भी शहरों की अपेक्षा दस साल पीछे का जीवन जी रहा है। यदि आप कोई मन्नत मांगना चाहते हैं या फिर कुछ दिन शहरी जीवन से नाता तोड़ कर  प्रकृति के कुछ अनछुये नजारों का आनंद लेना चाहते हैं तो यहाँ जरूर आयें।

16 Responses to “हनोल – प्रकृति का एक अदभुत नजारा”

  1. प्रदूशण से मुक्त प्रकृति की वादियों में बसे हनॉल के बारे में जानकार उसे एक बार देखने की इक्षा जागृत कर दी आपने. आभार.

  2. Vividh said

    मैं करीब १७-१८ वर्ष पहले हनोल गया था, अपने फूफाजी के साथ, जो देवता को मानते हैं. मुझे उस समय त्यूणी में तौंस नदी को देख कर अत्यन्त डर गया था. हनोल के पास में एक फॉरेस्ट रेस्ट हाउस भी था उस ज़माने में. अब तो पता नहीं है की नहीं, परन्तु उस तक पहुँचने के लिए एक झूलने वाले पुल से तौंस नदी पार करनी पड़ती थी, जो की अत्यन्त भयानक लगती थी और ऊपर से पूल झूल रहा हो तो और भी भयानक हो जाता था.

    हनोल में २-३ सिक्के (lead) के काफी भारी गोले थे, जो कि दोनों हाथों में उंगलियाँ फसा कर ही उठाये जा सकते थे. वे अहम् का प्रतीक थे. कि आप अपने अहम् को काबू में रख कर ही उन्हें उठा सकते हैं.

    उस रात को काफी तूफ़ान आया, और इस डर से कि सुबह बस नहीं मिलेगी काफ़ी लोग रात को ही पैदल निकल गए थे. इसमें किसी ने मेरे और मेरे भाई के रात को जूते चुरा लिए. बाद में हम त्यूणी तक बस में नंगे पैर आए. जहाँ पर फूफाजी ने हमारे लिए जूते खरीदे.

    हनोल में उस समय दयालों (दयाल)को काफी बोल बाला था. शायद अभी भी है. वे भीख मांगते हैं और किम्वदंती अनुसार, उन्हें देवता द्वारा चोरी करने की भी इजाजत है. शायद हमारे जूते दयालों ने ही लिए हों या फ़िर यात्रिओं ने. खैर मैंने उस दिन प्रण किया कि जहाँ से मुझे नंगे पैर आना पड़ा मैं दोबारा उस जगह पर कभी नहीं आऊँगा.

    खैर दूसरी बात यह भी है कि हमारा देवता दूसरे देवताओं की मानयता करने से भी परहेज़ रखवाता है.

    आपके लेख को पढ़ कर सारी यादें तरो ताज़ा हो गयी. मैं काफी कुछ भूल चुका था.

    धन्यवाद

    • Ranveer Chauhan said

      Vividh , Juta Chori Hona ek Ittaphak Ho Sakta Hai. Aur Kshama Kare, Devta Ya Bhagwan Hamara Ya Tumhara nahi Hota. Devta Ya Bhagwan Hawa aur Pani Ki taraha sabka Hota hai. Jo Devta Apka hai wo bhi sabka hai aur Hanol wala devta bhi sabka hai.

      Jai Hind. Jai Mahasu Devta , Jai Maa Hateshwari

      Ranveer Singh Chauhan

  3. विविध, अगर आप मन्दिर की तस्वीर देखें तो इन गोलों को पाएंगे। मैंने भी इन्हें उठाने की कोशिश की थी पर शायद मेरा अंहकार आड़े आ गया। फॉरेस्ट रेस्ट हाउस की मुझे जानकारी नहीं है। अगली बार गया तो जरूर वहां जाऊंगा।

    मन्दिर से जूते चोरी होने का मेरा भी अनुभव है। कॉलेज के समय एक बार कलकत्ता से शिमला, बनारस होकर आया था और वहां मेरे भी जूते चोरी हुए थे। पैसे पास थे नहीं के ढंग के जूते खरीद पाता। चप्पल से ही काम चलाया और शिमला आकर नए जूते ख़रीदे। दुबारा कभी बनारस का रुख नहीं किया।

  4. meenakshi said

    abhi april ke maheene mey hum sabhi parivar sahit yani saasji sasurji jetji jethaniji,pati aur baccho ke saath hanol,mahasu devta ke darshno ke liye gaye the.ek baat batana yaha jaroori samjhti hu ki mey is community ki nahee hu humari intercaste marriage hey.mandir mey ja ker jo mansik shanti aur sukun mila uska upbhog aaj tak ker rahee hu.devta ya bagwaan kisi ek ke nahee hote,sirf pyaar aur bhakti baav se jo unke pass aata hey wo usse apni kripa se laad dete hey.waha rakhe do gol pathhro ko mere pati ne utha liya tha per humare jetji se wo nahee uthe kyuki unki bhawana sahee nahee thi.ho sakta hey is mey sacchai ho.jab aap swayam dekte hey thabhi ahsaas hota hey.
    jai mahasu dev

  5. masijeevi said

    संयोग की ही बात है कि कल से तीन दिन का हनोल, सांकरी, पुरोला जाने का कार्यक्रम बनाया है, और जानकारी के लिए हिन्‍दी में गूगल सर्च मारा तो आपका ब्‍लॉग मिला, इससे कुछ सहायता हो जाएगी। हम अपनी गाड़ी से ड्राइव करते हुए जाएंगे… क्‍या ये चोरी के प्रकोप वाली बात को गंभीरता से लेने की जरूरत है ? एक भ्रू रास्‍ते को लेकर भी है…पाउंटा साहेब से एक रास्‍ता हिमाचल से होकर ट्यनी तक है (शिलाई होकर) दूसरा कलसी चकराता ट्यूनी होकर। दोनोंमें कौन सा ठीक रहेगा ? खासकर रास्‍ते की खूबसूरती के लिहाज से कौन सा बेहतर है ?

    • प्रिय बंधुवर
      यहाँ पधारने के लिए धन्यवाद्. चोरी वाली बात को गंभीरता से न लें. यह तो किसी के साथ कहीं भी हो सकता है. हनोल पहुँचने के लिए शिलाई होकर जाने वाला मार्ग काफी खस्ता हालत में है. कलसी वाला मार्ग फिर भी कुछ बेहतर है. हालाँकि आप इसे बहुत अच्छा नहीं कह सकते. यदि आप शांकरी की तरफ जा रहे तो मसूरी से नौगाँव, मोरी वाला मार्ग बेहतर है. हालाँकि यह थोडा लम्बा अवश्य है.

  6. Gaurav said

    Found a book on deities followed in our state on Google Books.
    Link – http://books.google.com/books?id=Xd50t19YpJEC&pg=PA80&dq=naga+cult&ei=rkaFSpaOC5PclQSqpOmgCg#v=onepage&q=naga%20cult&f=false
    Almost all the deities, traditions have been covered in this book. Found it to be a good read.
    Please go thru this if u have spare time.
    Thanks.

  7. Gaurav said

    Though I don’t have a very keen eye on religious affairs, but found it to be a good consolidated research work. Gr8 to be aware of the legends about our devtas.

  8. हनोल के बारे में जानकारी देने के लिए आपका धन्यवाद. मेरी लिस्ट में एक नाम और शामिल हो गया… हनोल का मंदिर सचमुच सुन्दर जान पड़ता है.
    एक और बात कहूं? मुझे लाल (बिन धुले) चावलों की कई दिनों से तलाश थी! कुछ किये शिमला में मिल ही नहीं पा रहे थे! वो कमी आपकी इस पोस्ट ने पूरी कर दी – साधुवाद.

    • गीताली जी
      यहाँ पधारने के लिए आभार.

      लाल चावल की फसल नवम्बर के अंत में आती है और यह बहुत जल्दी ख़तम भी हो जाती है. टुइनी के अलावा आप इसे निरमंड से भी मंगवा सकते हैं. निरमंड रामपुर बुशेहर के पास एक छोटा सा गाँव है. क्योंकि लाल चावल में फसल की आमद काफी कम होती है इस लिए यह धान कम ही लगाया जाता है.

  9. its a holy place.

    please visit once to this holy place you will realize on your self.

    no more Comments.

  10. Please visit on this url

    “Jai Mahasu Devta”

  11. Balkrishan said

    Jai Mahasu Devta

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